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राशबिहारी बोस: जापान में भारत के संदेशवाहक

यह कहना बिलकुल अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बुद्ध के अतिरिक्त राशबिहारी ही एक ऐसे भारतीय हैं जिसने जापानी मानसिकता पर कुछ प्रभाव डाला हो और जिससे जापानी जनता कुछ सहानुभूति रखती हो

The article has been translated into Hindi by Avatans Kumar

डाक्टर भगवान सिंह ज्ञानी (प्रीतम) क्रांतिकारी ग़दर पार्टी के अध्यक्ष और कमिश्नर थे। उन्होंने राशबिहारी बोस को कुछ इस तरह से बयान किया

“क्रांतिकारी अनूठे और निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

१) वो जो वातावरण और परिस्थितियों — चाहे वो जाती, सामाजिक, आर्थिक, और प्राकृतिक हों — के प्रति बाग़ी होते हैं। ऐसे लोग काफ़ी शिकवा–शिकायत करते हैं, कभी–कभी विरोध और रीति रिवाजों से किनारा भी। परंतु, दबाव में आकर ये झुक कर समझौता भी कर लेते हैं और पुनः उसी भेड़चाल का हिस्सा भी बन जाते हैं।

२) कुछ क्रांतिकारी ऐसे होते हैं जो थोड़े कठोर और मज़बूत होते हैं। वो देश, आदर्शों, और नैतिक मूल्यों के नाम पर कुछ भी सहने और त्याग करने के लिए तैयार रहते हैं। ऐसे क्रांतिकारी शायद ही कभी हतोत्साहित होते हैं, और अक्सर अकेले या फिर छोटे–मोटे समूहों में काम करते हैं।

३) फिर कुछ ऐसे भी क्रांतिकारी होते हैं जो दिखने में तो संत लगते हैं पर उनका रवैया काफ़ी वैज्ञानिक होता है। ये संगठन और आयोजन के मामलों में भी बड़े माहिर होते हैं। इनके राष्ट्र की परिकल्पना बिलकुल सधी और पक्की होती है, और क़दम–दर–क़दम एक सामाजिक व्यवस्था खड़ी करने की क्षमता अद्वितीय। ये मिलजुल कर समन्वय के साथ काम करते हैं,और एक दूसरे के संग का लाभ भी उठाते हैं। ये अपनी, तथा ख़ास तौर पर दूसरों की ग़लतियों से सबक़ लेते हैं और जब ज़रूरत पड़े तो बिना अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों में फेर–बदल किए, अपनी योजनाओं को बदलने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। इनकी शख़्शियत बड़ी उथल–पुथल वाली होती है, ये परिस्थितियों के मुताबिक़ आसानी से अपने आप को ढाल लेते हैं, और रुकावटों के बावजूद हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं।

हमारे श्री राशबिहारी बसु इसी (तीसरी कोटि) के थे।” (Two Rebels Meet, Dr. Bhagawan Singh Gyani (Pritam), पृष्ठ ५१५, [१०])।

हमने एक जूझारू, कभी न झुकने वाले क्रांतिकारी राशबिहारी बोस पर कुछ लेख पहले भी लिखे हैं [४], [१३]। यहाँ हम उनको एक राजनेता के रूप में दिखाएँगे। जब भारत और पूर्वी एशिया में उनके क्रांतिकारी प्रयास असफल हो गए तो वह शांति से उपयुक्त परिस्थितियों का इन्तज़ार करते रहे। यहाँ इस लेख में हम यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि किस तरह उन्होंने अपने जापानी विदेशवास का सदुपयोग भारत की सांस्कृतिक धरोहर और औपनिवेशिक प्रताड़ना को जगज़ाहिर करने, तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रति जागरूकता पैदा करने में किया। इस कड़ी में हम यह दिखाएँगे कि कैसे भारी मशक़्क़त से उन्होंने जापान के अभिजात्य समाज में अपनी पैठ जमाई, कैसे उन्होंने अपने को भारत की गतिविधियों से वाक़िफ़ रखा, कैसे जापान में रहने वाले भारतीयों ख़ास तौर पर छात्रों एवं शरणार्थी स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की और उनको संगठित किया। हम यह भी दिखाएँगे कि राशबिहारी बोस ने भारत में लोगों को जापानी गतिविधियों से आगाह रखा जिससे की उपयुक्त समय आने पर मिलजुल कर काम अंजाम दिया जा सके। इसे आप उनका दृढ़ विश्वास कह लीजिए या भारत और जापान जैसी दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच के अपनापन का भाव, जो भी हो उन्होंने एशियाई एकीकरण की सोच को काफ़ी बढ़ावा दिया। उन्होंने आनेवाली परिस्थितोयों, जिसमें भारत का ब्रिटिश राज से मुक्त होना भी शामिल था, से जूझने के लिए अपने आप को पूरी तरह से तैयार रखा। इस रूप में वे एक प्रकार से भारत के अनौपचारिक राजदूत के रूप में भी काम करते थे। जापान में बीती दो दशकों की इसी अवधि में ही उनके इंडीयन नैशनल आर्मी (या आज़ाद हिंद फ़ौज) जैसी मुहिम की नींव पड़ी।

सरदार पटेल ने एक दफ़ा क्रांतिकारियों को नीचा दिखाते हुए खुलेआम ये कहा था कि ये “कुछ बिगड़े शहज़ादे हैं जो बिना सरोकार इन चीज़ों में टाँग अड़ा रहे हैं। यहाँ तक कि कुछ नामी–गिरामी राजनैतिक समीक्षकों ने इन क्रांतिकारियों को “मूर्ख” तक कह डाला। क्रांतिकारी सचिंद्रनाथ सान्याल ने लिखा “कुछ नामी–गिरामी और एहतियाती समीक्षक तो इन क्रांतिकारियों को मूर्ख तक कहने में नहीं हिचकिचाते। एक प्रतिष्ठित मासिक माडर्न रिव्यू ऑफ  इंडिया के जाने–माने सम्पादक ने क्रांतिकारियों के संदर्भ में लिखा था कि “अगर हिंदुस्तान के थोड़े से क्रांतिकारी भी हथियारबंद हैं तो हिंदुसतानियों को अपनी विद्वता के बारे में शक होना चाहिए” पृष्ठ १६७–१६९, [९]। इस प्रकार की मान्यताओं के बावजूद इन क्रांतिकारियों में से वो जो अपनी जान कुछ दिनों तक बचा सके, ने यह साबित कर दिया कि वे सिर्फ़ कुशल राजनयिक ही नहीं, बल्कि बड़े समझदार और बुद्धिमान भी हैं। राशबिहारी बोस कुछ ऐसे ही क्रांतिकारी थे।

सेक्शन A: मतप्रचार की लड़ाई

 एक ग़ुलाम देश को अपने स्वतंत्रता की लड़ाई कई मोर्चों पर लड़नी होती है। उन मोर्चों में एक है विदेश में अपने संग्राम के प्रति मत जुटाना जिससे कि ग़ुलाम बनाने वाले देश और उसकी दमनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ एक अंतर्राष्ट्रीय दबाव का माहौल तैयार किया जा सके। १० जून, १९३३ को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने मत–प्रचार की ज़रूरत के बारे में बात करते हुए कहा कि “बर्तानवी दुष्प्रचार की बनिस्पत विश्व में हिंदुस्तान की छवि आंतरिक कलहों वाले देश की बनी है जिसमें अंग्रेज़ों की भूमिका एक शांतिदूत की है। अनेक देशों की तरह भारत में भी अंदरूनी कलहें रहीं हैं। पर इन कलहों को लोगों ने आपस में मिलजुल कर निबटा लिया। इसी वजह से भारत में प्राचीन काल से ही शांतिपूर्ण शक्तिशाली साम्राज्यों,जैसे अशोक महान, की परम्परा रही है। लेकिन आज–कल के झगड़े और कलह कृत्रिम व स्थाई है तथा इनको फैलाने–भड़काने वाले लोग बाहरी। और मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं कि जबतक हिंदुस्तान में अंग्रेज़ी राज है, भारत के लोगों को सच्ची एकता नहीं मिल पाएगी। हालाँकि अंग्रेज़ी राजनैतिक पार्टियों से हमें मदद की कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए,लेकिन हमें विदेशों में संगठित हो कर भारत के लिए प्रचार करना चाहिए। प्रचार का काम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का होना चाहिए। नकरात्मक प्रचार के अंतर्गत हमें भारत के ख़िलाफ़ बर्तानवी प्रतिनिधियों के द्वारा किए गए सारे दुष्प्राचारों का, चाहे वो दुष्प्रचार जान–बूझकर किए गए हों या अनजाने में, मुँहतोड़ जवाब देना चाहिए। सकारात्मक प्रचार के तहत हमें भारत की भव्य सांस्कृतिक विरासत तथा हमारी शिकायतों का भी कच्चा–चिट्ठा खोलना चाहिए। यह बात बिना हिचकिचाहट के कही जा सकती है कि लंदन को इस प्रचार–तंत्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया जाना चाहिए। खेद इस बात का है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अभी तक अंतर्राष्ट्रीय प्रचार के महत्व को समझ नहीं पाई है। लेकिन हमें अब यह उम्मीद है कि आने वाले दिनों में हमारे देश के लोगों को अंतर्राष्ट्रीय प्रचार की महत्ता का भान होगा। अंग्रेज़ी लोगों की किसी एक बात का मैं अगर क़ायल हूँ तो वह है उनकी प्रचार करने की क्षमता। अंग्रेज़ जन्म से ही प्रचार/दुष्प्रचार में महारथी होते हैं,और उनके लिए यह तोप से भी ज़्यादा ताक़तवर है। ब्रिटेन के अतिरिक्त रूस ही यूरोप का एक ऐसा देश हैं जिसने इस प्रकार के कुछ कौशल सीखे हों। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि रूस ब्रिटेन को फूटी कौड़ी नहीं सुहाता है, यहाँ तक कि उसे इस बात का डर रहता है कि रूस कहीं ब्रिटेन की इस छिपी हुई सफलता की कूँजी को उजागर न कर दे। दुनियाँ में अंग्रेज़ों के द्वारा भारत के विरुद्ध इतनी विद्वेषपूर्ण बातें कहीं जाती हैं कि अगर हम अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अपनी शिकायदों का पुलिंदा दुनियाँ के सामने खोल दें तो हमें दुनियाँ भर में सहानुभूति मिलेगी। अब मैं आपसे कुछ ऐसी चीज़ों के बारे में बातें करूँगा जिसके तहत पूरे विश्व में सक्रिय प्रचार आवश्यक है: (१)भारत में राजनैतिक बंदियों के प्रति दुर्व्यवहार तथा दीर्घकालिक राजनैतिक बंदियों को बीमारु अंडमान द्वीप में भेजना, जहाँ अनशन की वजह से दो लोगों की मृत्य तक हो चुकी है। (२) भारतियों को पासपोर्ट देने में सरकार ने जिस प्रकार के प्रतिशोध की भावना जतायी(ज़्यादातर लोगों को यह मालूम भी न होगा कि न जाने कितने ही हिंदुस्तान से बाहर जानेवाले भारतियों को पासपोर्ट नहीं जारी किया गया। उसी प्रकार से विदेश में रहने वाले न जाने कितने ही भारतियों को हिंदुस्तान लौटने के लिए पास्पोर्ट जारी नहीं किया गया।) (३)भारत में हवाई जहाज़ से बमबारी करना, ख़ास तौर पर पश्चिमोत्तर प्रदेशों के बेसहारा गाँव वालों को आतंकिक करने के लिए। (४) अंग्रेज़ी शासन के द्वारा जहाज बनाने समेत अन्य भारतीय उद्योगों का गला घोंटना। (५) भारत में आटवा पैक्ट समेत शाही तरजीह की योजनाओं का भारी विरोध (यह जग ज़ाहिर होना चाहिए की आटवा पैक्ट भारत के ऊपर थोपा गया था, भारत ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया)। (६) किसी भी प्रकार के सीमा शुल्क में छूट का भारी विरोध। (७) मुद्रा विनिमय दर का एकतरफ़ा नियंत्रण जो भारत के हितों के ख़िलाफ़ हो। जिस प्रकार मुद्रा विनिमय दर में दखलंदाजी कर के अंग्रेज़ों ने भारत के करोड़ों रुपयों की लूट की उसकी सनद सारी दुनियाँ को होनी चाहिए। (८) आगे, सारी दुनियाँ को इस बात का भी पता चलना चाहिए के कैसे अंग्रेज़ों नें भारत को एक क़र्ज़दार देश में तब्दील कर दिया। भारत के लोग इस क़र्ज़ के लिए क़तई ज़िम्मेवार नहीं हैं। १९२२ के गया अधिवेशन में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह ख़ुलासा कर दिया था कि भारत किसी सरकारी क़र्ज़ का ज़िम्मेदार नहीं होगा। यह बात सबको मालूम है कि ये क़र्ज़ भारत के लाभ के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के लाभ के लिए है। पृष्ठ २५७–२५९, [१६]।

विट्ठल भाई पटेल ने देश के काम के लिए सुभाष चंद्र बोस के नाम १,००,००० रूपए विरासत में रख छोड़े थे पृष्ठ ३०४, [३]। इस पैसे से सुभाष चंद्र बोस सारे विश्व में भारत का ग़ैरसरकारी दूतावास खोलना चाहते थे पृष्ठ ३६, [१५]। पटेल उन कुछ गिने–चुने भारतियों में से थे जिनकी रुचि इन प्रचारों में थी पृष्ठ ३६५, [३]।

सचिंद्रनाथ सान्याल ने लिखा था: “यूरोप और अमेरिका में भारत के प्रति जागरूकता पैदा करने के महत्व को भारत के नेतागण आज तक समझ नहीं पाए हैं, क्योंकि अगर वो समझते तो इसकी तरफ़ ज़रूर ध्यान देते। हमारे नेताओं को ज़रा भी भान नहीं है कि अंग्रेज़ों ने इस मद में कितना ख़र्च किया है। इसी वजह से जब कभी कोई हिंदुस्तानी भारत की आज़ादी की बात करता है तो हिंदुस्तान के नेता अंग्रेज़ी राज के सद्गुणों का राग अलापने लगते हैं” पृष्ठ १४५, [९]।

सेक्शन A: जापान में राशबिहारीजी के द्वारा सकारात्मक और नकारात्मक मतप्राचार

 सुभाष बोस जी को, और संभवत: सान्याल जी को भी, यह पता नहीं था की एक दूसरा बोस कोई अट्ठारह साल पहले ही भारत के लिए मत–प्रचार का काम शुरू कर चुका था। राशबिहारी बोस सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार का मतप्राचार शुरू कर चुके थे। वो दुनियाँ में भारत की सांस्कृतिक विरासत और अंग्रेज़ों द्वारा भारत के राजनैतिक और आर्थिक उत्प्रीड़न दोनों को उजागर कर रहे थे।

राशबिहारी बोस जून १९१५ को जापान पहुँचे। २७ नवम्बर १९१५ को उन्होंने टोक्यो के उएनो पार्क स्थित मशहूर सीयोकेन होटेल में एक सभा आयोजित की पृष्ठ ६, [८] पृष्ठ ५५०, [१०]। इस सभा में जापान के अभिजात्यों (ऊँचे ओहदे वाले राजनयिक, सम्पादक, लेखक,जाने–माने लोग) ने शिरकत की। ज़ोरगेज़ ओशावा ने इसके बारे में लिखा है: “लाला लाजपत राय के भाषण ने सभी जापानी मेहमानों को विचलित कर दिया। सभी वक्ताओं ने अंग्रेजो की दमनकारी कार्यशैली की खुलकर निंदा की,” पृष्ठ ६, [८]। यह एक प्रकार से नकारात्मक प्रॉपगैंडा ही था। सबरवाल ने लिखा: “अमेरिकी मिलकियत वाली जापानी विज्ञापन कम्पनी के सम्पादक स्वर्गीय ह्यू बायस ने लाला जी के भाषण देने की क्षमता और उनके राजनेता वाले गुणों की तुलना लोयड जॉर्ज से की जिसकी ख़बर अगले दिन अख़बारों में भी छपी” पृष्ठ ५५०, [१०]। सम्मेलन बहुत सफल हुआ। ओशवा लिखते हैं: “दावत और भाषणों की ख़बर सुनकर अंग्रेज़ी दूतावास इतना घबराया की उसने जापानी विदेश मंत्री से जापान में रहनेवाले सभी भारतियों के देशनिकाले की माँग कर दी। …… अगली सुबह लाला लाजपत राय अमेरिका को भाग निकले और बोस एवं गुप्ता को थाने में बुलाकर देशनिकाले का आदेश थमा दिया गया। उन्हें देश छोड़ने के लिए पाँच दिनों का समय दिया गया” पृष्ठ ६–७, [८]। राशबिहारी देशनिकाले से बचने के लिए जापान में ही छिप गए। बाद में कुछ मशहूर जापानियों की पहल पर देशनिकाले के आदेश को वापस ले लिया गया।

राशबिहारी पूरे जापान में घूम–घूम कर सम्मेलनों में शिरकत करते रहे। जहाँ भी जाते, हर जगह वे भारत–जापान सम्बन्धों, भारतीय संस्कृति, भारतीय रहन–सहन, अंग्रेज़ों की नृशंसता, और एशियायी देशों के गुट के बारे में बात करते। वे समय–समय पर कोरिया जा कर वहाँ के सांस्कृतिक और बुद्धिजीवी ग्रुपों को प्रभावित करने की कोशिश भी करते पृष्ठ ३३, [८]। जेन–ईची सुज़ूकी राशबिहारी के भाषणों की बात करते हुए लिखते हैं “मैंने अक्सर श्री बोस के साथ एक ही मंच से कई भाषण दिए हैं। कभी–कभी श्री बोस ने आँसू भरी आँखों से दुहाई दी जिससे सभी जापानी मंत्र–मुग्ध हो गए पृष्ठ ४८, [१०]। जापानियों ने उन्हें सेन्साइ (शिक्षक, गुरु) की उपाधि दे डाली (एस ए अय्यर, पृष्ठ ४४३, [१०]। उसके बाद वो अपने चहेतों और जापानियों में इसी नाम से पहचाने जाने लग गए। जापानी राजघराने के एक राजकुमार ने १९२३ में एक बार राशबिहारी बोस के भाषण में शिरकत की थी। राशबिहारी के अपने ही शब्दों में, “सन १९२३ में एक बार एक रेजिमेंट के कमांडिंग अफ़सर ने मुझे भारत के ऊपर बोलने की लिए बुलाया था। उस वक़्त महामहिम (राजकुमार चिचूबु,जो जापानी महाराज जिनकी मृत्यु १९२६ में हो गयी थी के दूसरे पुत्र) से मेरी जान–पहचान हुई। उन्होंने आगे बढ़कर मुझसे हाथ मिलाया और मेरी भारत सम्बंधी बातों को बहुत ध्यान से सुना [७]।

जापान में रहते हुए राशबिहारी जी ने काफ़ी कुछ लिखा। ज़्यादातर वो जापानी में ही लिखते थे, पर कभी–कभार अंग्रेज़ी और एकाध बार बंगला में भी। उनकी जापानी भाषा में लिखी किताबों के नाम हैं १) एशियाई क्रांति का विहंगम दृश्य (१९२९), २) भारत का हास्य और व्यंग (१९३०), ३) उत्पीडित भारत (१९३३), ४) भारत के लोगों की कहानी (१९३५), ५)क्रांतिमय भारत (१९३५), ६) युवा एशिया की जीत (१९३७), ७) रोता भारत (१९३८), ८)भागवत गीता (१९४०), ९) भारत का करुण इतिहास (१९४२), १०) बोलता भारत (१९४२),११) आज़ाद भारत का उदय (१९४२), १२) आज़ादी की जंग (१९४२), १३) रामायण(१९४२), १४) रबीन्द्रनाथ की शेष कविता का अनुवाद (१९४३), १५) भारत और भारतीय(१९४३), १६) बोस की अपील (१९४४) पृष्ठ ३४, [८]। हम सब इन पुस्तकों की जाँच नहीं कर सके क्योंकि इनके अनुवाद उबलब्ध नहीं है। पर नाम से ऐसा लगता है कि जहाँ २), ४),८), १३), १४) सकारात्मक प्रॉपगैंडा की पुस्तकें रही होंगी वहीं ३), ५), ७), ९), १२)नकारात्मक प्रॉपगैंडा की। राशबिहारी एशियन रिव्यू नाम की पत्रिका से भी काफ़ी क़रीब से जुड़े थे। एशियन रिव्यू की शुरुआत फ़रवरी १९२० में हुई थी। नवम्बर १९२१ तक इस पत्रिका में भारत के ऊपर बहुत से लेख छपे थे जिसमें संगीत–समवाद का अंग्रेज़ी अनुवाद, सी आर दास की कविता, मोतीलाल रॉय और उनके आश्रम (चित्र सहित), रबिंद्रनाथ, भारत (और विश्व) की घटनाओं पर लेख भी शामिल थे। इन सब लेखों के रचयिता सम्भवत: राशबिहारी ही थे। वो इन मामलों में गुमनाम ही रहना चाहते थे क्योंकि फ़िलहाल उन्हें जापानी नागरिकता नहीं मिली थी। उनके ज़्यादातर लेखों का अंग्रेज़ी या भारतीय भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध नहीं है। राशबिहारीजी ने सुभाष बोस की पुस्तक जापान के लिए भारतीय संघर्ष का अंग्रेज़ी अनुवाद करवाने की भी व्यवस्था करवाई थी।

हम अब कुछ और सकारात्मक और नकारात्मक प्रॉपगैंडा का वर्णन करेंगे।

सेक्शन B: सकारात्मक मतप्राचार

श्रद्धेय निकी किमुरा कलकत्ता विश्वविद्यालय में १५ वर्षों तक बौद्ध दर्शन एवं इतिहास के लेक्चरर थे। उन्हें सर आशुतोष मुखर्जी ने, जो कलकत्ता विश्वविध्यालय के वाइस चैन्सेलर थे, १९१५ में बहाल किया था। निकी किमुरा ने राशबिहारी जी के बारे में लिखा था: “उन्होंने भारत, भारत के धर्मों, और भारत के राजनैतिक ख़बरों से हमारा परिचय कराने का प्रयत्न किया। उन्होंने गांधी के राजनैतिक आंदोलन पर विशेष ध्यान देते हुए गांधी की लिखी पुस्तकों से हमारा परिचय कराया। उन्होंने जापान में भारत की प्राचीन संस्कृति को पेश किया” पृष्ठ ११, [१०]। श्रीमान जेन–ईची सुज़ूकी तोक्यो में शिन–निहोन क्योगि–काई संस्था के निदेशक थे। उन्होंने जापान में भारत के प्रति जागरूकता पैदा करने में राशबिहारी जी के योगदान की चर्चा करते हुए लिखा है कि “लाखों करोड़ों जापानी राशबिहारी के नाम से वाक़िफ़ हैं और उनसे सहानुभूति भी रखते हैं। यहाँ तक कि आज भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा होते ही जापानी लोगों को राशबिहारी का नाम याद आता है। यह कहना बिलकुल अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बुद्ध के अतिरिक्त राशबिहारी ही एक ऐसे भारतीय हैं जिसने जापानी मानसिकता पर कुछ प्रभाव डाला हो और जिससे जापानी जनता कुछ सहानुभूति रखती हो” पृष्ठ ४८, [१०]। ९ जुलाई १९२२ को राशबिहारी ने तोक्यो से सचिंद्रनाथ सान्याल को लिखा था: “जब मैं पहली बार यहाँ आया था, जापानी लोगों को भारत के मामलों की कोई ख़ास जानकारी नहीं थी। यह हमारे ही प्रयासों और बलिदानों का असर है कि आज हर जापानी भारत में हो रही घटनाओं से पूरी तरह वाक़िफ़ है। मंत्रियों,वकीलों से ले कर सांसदों, पत्रकारों और छात्रों तक से मेरी दोस्ती है। गांधी और भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी बहुत सी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा बहुत से पत्र–पत्रिकाएँ नियमित रूप से भारत सम्बंधी लेख छाप रहे हैं। इसी महीने जापान विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने भारत के बारे में जापानी भाषा में एक ग्रंथ प्रकाशित किया है। अगले महीने मैं तीन दिनों तक लगातार भारत के विषय में बात करूँगा … आज ज़्यादातर लोग यहाँ एशियायी स्वतंत्रता से इत्तेफ़ाक रखते हैं। यहाँ तक कि बुज़ुर्ग और ओहदेदार लोग भी अरब से लेकर चीन तक जागी इस नई चेतना से सहानुभूति रखते हैं” पृष्ठ १३२–१३३ [९]।

सेक्शन B.1: भारतीय नेताओं की प्रशंसा

 राशबिहारी की सकारात्मक प्रॉपगैंडा में समकालीन भारतीय नेताओं की प्रशस्ति भी शामिल थी। इनमें कुछ ऐसे नेता भी थे जिनके बात–विचार से राशबिहारी इत्तेफ़क नहीं रखते थे। आख़िर राजदूत तो ऐसे ही होते हैं — वे विदेशों में, अपने निजी विचारों और मुद्दों से ऊपर उठ कर, अपने देश की छवि को बढ़ाने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के तौर पर, मोहनदास गांधी से गम्भीर वैचारिक मतभेद होने के बावजूद उनके प्रति राशबिहारी का सार्वजनिक तेवर क़ाबिलेतारीफ़ था। २२ अगस्त १९२२ के स्टैंडर्ड बेयरर में गांधी के असहयोग आंदोलन के बारे में उन्होंने लिखा था: “भारतीय लोगों को अब गोरे लोगों के शासन में रहना मुश्किल लगने लगा, इसी वजह से गांधी और उनके सहयोगी सड़कों पर उतर आए। गांधी को तो अंग्रेज़ों ने गिरफ़्तार कर जेल में भेज दिया पर उनके विचारों पर पाबंदी लगाना मुश्किल था। गांधी के तीस करोड़ अनुयायी भारत की आज़ादी के लिए दृढ़–प्रतिज्ञ थे” पृष्ठ ३५९, [१०]। सितम्बर १९३२ में गांधी जी के पूना अनशन के समाप्त होने पर इंडीयन इंडेपेंडेन्स लीग के अध्यक्ष होने के नाते जारी अपने बयान में राशबिहारी ने कहा था कि “पूरी दुनियाँ में भारत के लोग इस समाचार से ख़ुश हैं कि गांधी जी ने अपना तीन हफ़्ते पुराना पूना–वाला अनशन सफलता पूर्वक ख़त्म किया। यह अनशन भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत के दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ था।

तीन हफ़्ते पहले जब महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ी हुकूमत के अत्याचारों के प्रति विश्व भर में जागरुकता जगाने के लिए यह अनशन शुरू किया था तब उन्होंने यह ऐलान किया था कि वे इस इस अग्नि–परीक्षा में सफल ज़रूर होंगे। गांधी जी की उम्र और छः महीने की जेल यात्रा की वजह से उनका गिरता स्वास्थ्य भारतवासियों और उनके तमाम विदेशी मित्रों के लिए एक गहरी चिंता का विषय था। गांधी जी के डाक्टरों ने भी इस विषय पर अपनी चिंता जतायी।

थके–हारे गांधी जी ने इस अनशन को दृढ़ता से झेला और विजयी हुए। इसे ईश्वर की असीम अनुकंपा कहिए या आध्यात्मिक शक्ति। मैं व्यक्तिगत रूप से गांधी जी की इस चमत्कारपूर्ण विजय को, जिसने इन तीन हफ़्तों में अंग्रेज़ी हुकूमत की नीव हिला दी है,भारत के लोगों की विजय का संदेश मानता हूँ — भारत के स्वतंत्रता संग्राम के विजय का संदेश।

पिछले सात महीनों से राष्ट्रवादी भारतियों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ एक जंग छेड़ रखी है। गांधी जी के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए भारतीय देशभक्तों ने एक साफ़–सुथरी लड़ाई लड़ी। भारत ने अंग्रेज़ी अधर्म का जवाब धर्म, असत्य का जवाब सत्य, छल–प्रपंच का जवाब सादगी और खुलेपन, आतंकवाद एवं धमकियों का जवाब बहादुरी और संयम, से दिया। राष्ट्रवादी भारतियों ने अंग्रेज़ों की पश्विक नीतियों का कच्चा चिट्ठा खोल कर पूरे विश्व के सामने रख दिया। निहत्थे भारतियों ने अंग्रेज़ों के नियोजित अत्याचार की खुली अवहेलना की, और आज भी करते आ रहे हैं।

पूना के अंग्रेज़ी जेल की दीवारों के पीछे महात्मा गांधी का हृदय अपने चालीस करोड़ देशवासियों के लिए धड़कता था — ख़ून चूसनेवाली अंग्रेज़ी हुकूमत के बर्बरतापूर्ण अत्याचारों एवं लूट–खसोट को झेलने वाले असहाय देशवासियों के लिए। १० फ़रवरी को गांधी जी ने अपना आख़िरी अस्त्र छोड़ भी दिया। बतौर कारावासी अंग्रेज़ों के वहशीपने के प्रति अपना विरोध जताने के लिए अब महात्मा जी के पास कोई और चारा भी नहीं बचा था।

सारा हिंदुस्तान गांधी जी के स्वास्थ्य का समाचार सुनने के लिए घंटों और दिनों तक बेसब्री से इन्तज़ार करता रहा पर अंग्रेज़ों के कानों पर जूँ तक न रेंगी। जब हिंदुस्तान के साथ सारा विश्व गांधी जी के जीवन की उम्मीद लगाए प्रार्थना कर रहा था, पत्थरदिल अंग्रेज़ गांधी जी के मौत की आस लगाए बैठे थे। जब सारी दुनियाँ के सही–दिमाग़ वाले लोग गांधी जी और हिंदुस्तान के हितों के प्रति हमदर्दी जता रहे थे, अंग्रेज़ गांधी जी की हत्या और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विनाश के मंसूबे गढ़ रहे थे। अंग्रेज़ी वायसराय ने भारतवासियों के द्वारा महात्मा गांधी के रिहाई की माँग को तिरस्कारपूर्वक ठुकरा दिया। रिहाई की माँग को लेकर गए तीन रौबदार महानुभावों की भी नहीं सुनी। इतना ही नहीं, वायसराय ने इनसे निर्लज्जता के साथ गांधी जी के बहुमूल्य जीवन को लेकर मोल–तोल की भी बातें की।

पर आज गांधी जी की जीत हुई है, वो अनशन से बचकर वापस आ गए हैं। वहीं दूसरी ओर अंग्रेज़ी वायसराय और उनके इस अपराध में शामिल साझेदारों को मुँह की खानी पड़ी है। गांधी जी की यह जीत उनकी प्रेरणादायक आध्यात्मिक शक्ति की ही नहीं, बल्कि यह हिंदुस्तान की जीत है; यह भारत के धार्मिक चेतना की जीत है। यह जीत भारतीय लोगों के अंदर एक आत्मविश्वास पैदा करने वाली शक्ति की जीत है — वह आत्मविश्वास जो कि इस दुष्ट अंग्रेज़ी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंक देगी।

यह एक ऐसी जीत है जो हिंदुस्तान के लोगों को महात्मा गांधी के जीवन लक्ष्य को पूरा करने में अपने प्राणों तक की आहुति देने को प्रेरित करेगी। आज, जिस दिन महात्मा गांधी ने जिस सफलता से अपना अनशन तोड़ा,वह दिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम की यात्रा का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

आज हमारे प्रिय नेता महात्मा गांधी के अंग्रेज़ी दुश्मनों के ख़िलाफ़ भारत की विजय के शुभ अवसर पर मैं उन सब भारत के मित्रों का, जिन्होंने इस संकट की घड़ी में भारत का साथ दिया है, शुक्रगुज़ार हूँ। मैं उन सभी मित्र देशों का भी, जिन्होंने साझा ऐंग्लो–अमेरिकन दुश्मनों के ख़िलाफ़ लड़ाई में हम भारतियों का साथ दिया है, का तहे दिल से देश–विदेश में रह रहे तमाम हिंदुस्तानियों की तरफ़ शुक्रिया अदा करता हूँ। और मैं पूर्वी भारत में रहने वाले सभी भारतियों की तरफ़ से इस महान जापान देश का जिसने भारत के स्वतंत्रता की इस लड़ाई में जी भर के सहायता की, उस जापानी सरकार की और उसकी अदम्य निप्पोन सेना का आभार प्रकट करता हूँ। मैं इस बात की भी तस्कीद करना चाहता हूँ कि हम भारतीय जापानी भाइयों के साथ तब–तक कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेंगे जब तक ऐंग्लो–अमेरिकन ताक़तें एशिया में नेस्तनाबूद नहीं हो जातीं। पिछले तीन हफ़्तों की इस मुसीबत और दुविधा की घड़ी में जापानी राष्ट्र और सरकार की तरफ़ से जिस प्रकार भारत के प्रति आश्वासन और सहानुभूति का संदेश मिला है वह सभी भारतियों के लिए कृतज्ञता और प्रोत्साहन का विषय है।

आज, गांधी जी की भारत के अंग्रेज़ दुश्मनों के ख़िलाफ़ विजय के दिन, मैं देश–विदेश में रहने वाले सभी देशवासियों से यह विनती करता हूँ कि वे अपने–आप को भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आख़िरी मुहिम में पूरी तरह झोंककर अपने प्रिय नेता महात्मा गांधी को उनके जीवन के लक्ष्य को पूरा करने में शिरकत करें। उनसे मेरा यही कहना होगा कि अबकी बार पलड़ा हमारा भारी है। अंग्रेज़ों ने अभी भारत में मुँह की खाई है और भारतियों ने अंग्रेज़ों की ख़िलाफ़ एक आध्यात्मिक लड़ाई जीती है। यही मौक़ा है आख़िरी हमले का। हमें एकजुट होकर अपने आप पर पूरा भरोसा रखते हुए जान की बाज़ी लगाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। यही था गांधीजी का पैग़ाम हम भारतियों के लिए। इसी पैग़ाम को हम तक पहुँचाने के लिए गांधी जी ने अपने जान की बाज़ी लगाई थी। हम सभी भारतियों को गांधीजी की इस पुकार का जवाब देना चाहिए। हम सभी भारतीय — चाहे वो सेना के सिपाही हों या अफ़सर,कर्मचारी हों या किसान — को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खड़े हो कर उस दानवी हुकूमत जिसने गांधीजी की हत्या और भारत की राष्ट्रीयता को रौंदने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी, की हर आख़िरी निशानी को नेस्त–नाबूद कर देना चाहिए। ईश्वर की इच्छा है कि हिंदुस्तान आज़ाद हो, ईश्वर की इच्छा है कि गांधीजी आज़ाद हिंदुस्तान के नेता बनें” पृष्ठ २१५–२१८ [१०]।

अब सवाल यह उठता है कि राशबिहारी बोस की गांधीजी की प्रशस्ति कितनी वास्तविक और कितनी दिखावटी है। यहाँ यह बात ख़याल रखने योग्य है कि गांधीजी की हठधर्मी अहिंसा और राशबिहारी के स्वराज्य में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ था। गांधीजी कट्टरपंथी अहिंसावादी थे। उनके अहिंसावाद के अंतर्गत हिंदुओं को आक्रमणकारियों पर प्रहार करने की छूट नहीं थी। गांधीजी ने प्रथम विश्व–युद्ध के दौरान भारतियों के अंग्रेज़ी सेना में भर्ती का अभियान चलाया था, जबकि राशबिहारी सशस्त्र क्रांति से अंग्रेज़ी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे थे। गांधीजी यह बख़ूबी जानते थे कि इस्लामी ख़िलाफ़त आंदोलन अहिंसक नहीं है। फिर भी उन्होंने उस आंदोलन का खुलेआम समर्थन किया। इसके विपरीत राशबिहारी बोस ने अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत एक क्रांतिकारी रूप में की थी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिंसा को कभी अनैतिक नहीं माना। सशस्त्र क्रांति को मद्देनज़र रखते हुए राशबिहारी ने १९२४ में जापान में इंडेपेंडेन्स लीग की स्थापना की और उसके संस्थापक अध्यक्ष भी बने पृष्ठ ५६१ [१०]। राशबिहारी बोस के क़रीबी रह चुके (१९४२) नेद्यम राघवन के मुताबिक़: “हमारे नेता, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, इत्यादि के प्रति राशबिहारी की अगाध श्रद्धा थी। उन्हें (राशबिहारी को) ऐसा लगता था कि भारत में रहने की वजह से भारत का स्वतंत्रता संग्राम काफ़ी सीमित और प्रतिबंधित सा था। मुझे ऐसा कहने के लिए माफ़ करें, पर वो अहिंसावादी क़तई नहीं थे। उन्होंने कई बार यह बात दृढ़विश्वास के साथ कही कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिंसा और अहिंसा दोनों को साथ–साथ चलना चाहिए। उनके मुताबिक़ हिंसा और अहिंसा दोनों एक जायज़ मुक़ाम तक पहुँचने के जायज़ रास्ते हैं” पृष्ठ ४३८, [१०]। राघवन यहाँ राशबिहारी के गांधी और नेहरू के प्रति आदर और सम्मान के ‘दिखावेपन’ पर टिप्पणी कर रहे हैं। साथ ही वे राशबिहारी की हिंसा के प्रति प्रतिबद्धता की भी गवाही दे रहे हैं। राशबिहारी के मुताबिक़ गांधी और नेहरू की आज़ादी की लड़ाई सीमित थी। आज़ाद हिंद फ़ौज ने इन्हीं राशबिहारी के उत्तराधिकारी सुभाष चंद्रा बोस के नेतृत्व में अंग्रेज़ों और अमरीकियों के ख़िलाफ़ ऐलानेजंग किया था।

राशबिहारी ने २५ जनवरी १९२४ को सुभाष बोस को एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें उनकी विचारधारा खुलकर सामने आ गयी थी। यह चिट्ठी सार्वजनिक नहीं थी पर उसमें उन्होंने खुलकर यह बात लिखी थी कि भारत का उद्धार शिक्षा और सफ़ाई से नहीं होने वाला। सनद रहे कि गांधीजी ने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के द्वारा किए किए जाने वाले सामाजिक कार्यक्रमों की जमकर हिमायत की थी जिसकी वजह से स्वतंत्रता संग्राम से जन–शक्ति तथा अन्य संसाधनों को हटाना पड़ता था, और गांधीजी स्वयं छुआछूत के ख़िलाफ़ कई अनशन कर चुके थे। यहाँ तक कि उन्होंने अहिंसा की अन्धभक्ति का उपहासपूर्ण कटाक्ष भी किया जिससे यह ज़ाहिर होता है कि उनकी इस चिट्ठी में लिखी गयी बातें गांधी जी के अहिंसा और स्वच्छता जैसे उन सभी विचारों के प्रतिकूल थीं। दुर्भाग्यवश वह चिट्ठी सुभाष चंद्र बोस तक पहुँचने से पहले ही अंग्रेज़ों के हाथ लग गयी।

किसी का आदर करते हुए भी उस व्यक्ति से असहमत होना बहुत बड़ी बात नहीं, परंतु यह मतभेद बुनियादी था। इस कारण से राशबिहारी का गांधीजी के प्रति सार्वजनिक गुणगान विदेशों में भारत की छवि को बढ़ाने का एक ज़रिया था। गांधीजी के आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय संचार माध्यमों में काफ़ी प्रचार मिला जिसमें अप्रकट रूप से अंग्रेज़ का बड़ा सहयोग था [८] जिसकी वजह से उनकी महात्मा वाली छवि बहुत लोकप्रिय हो पायी। उदाहरण के स्वरूप, राशबिहारी के २३ जनवरी १९२३ के स्टैंडर्ड बेयरर के साथ हुए पत्राचार को देखें जिसका संदर्भ ओसाका मैनीचि नामक अख़बार में गांधीजी के बारे में छपी ख़बर से था: “हालाँकि गांधी, कमाल, और मूसोलिनी व्यक्तित्व में एक–दूसरे से काफ़ी अलहदा थे,इन सबको ऐसे व्यक्तियों की श्रेणी में रखा जा सकता है जिनकी शोहरत और ताक़त का उत्थान आधुनिक विश्व इतिहास में युद्ध के बाद बड़ी तेज़ी से हुआ। भारत की स्वतंत्रता संग्राम के नायक महात्मा गांधी अभी देशद्रोह के मामले में जेल में हैं, पर उनके साथ सारा देश भी खड़ा है। तुर्की के नेपोलियन कमाल पाशा अपने देश की तक़दीर अपनी मुट्ठी में बांधे रखे हैं। फ़ासी पार्टी के नेता सेन्योर मूसोलिनी संसद के अनिश्चितक़ालीन स्थगन से इतने ताक़तवर हो गए हैं कि वे व्यावहारिक रूप से एक तरह से इटली के तानाशाह बन चुके हैं। पर इन तीनों राजनायकों में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं महात्मा गांधी, क्योंकि वे न सिर्फ़ एक राजनेता ही है बल्कि एक आध्यात्मिक देवदूत भी जिनके असहयोग और अहिंसा के सिद्धांतों के अनुगामी भारत के लोग ऐसे हुए हैं जैसे भेंड़ गरेडिये के होते हैं। जहाँ एक ओर अन्य दोनों राजनेताओं ने अपनी अपनी ताक़त दबाव और सैन्य शक्ति से हासिल की है वहीं दूसरी ओर भारत के जननायक ने यह ताक़त अपनी आध्यात्मिक शक्ति और अपने व्यक्तित्व के बलबूते पर हासिल की, और वह भी बिना चाहत के। जो भी हो, इन तीनों जननायकों का उनके अपने देशों में उत्थान इस बात को साबित करता है कि दुनियाँ में जननायकों की पूजा की महत्ता कभी समाप्त नहीं होगी” पृष्ठ ३७४–३७५ [१०]। राशबिहारी को इस बात का एहसास था कि गांधीजी की लोकप्रियता और भारत के स्वतंत्रता संग्राम से उनका सम्बंध भारत की स्वतंत्रता के मुहिम को सबकी आँखों के समक्ष खड़ा कर देंगे। राशबिहारी ने गांधीजी की लोकप्रियता तो आगे फैलाने में उत्प्रेरक का काम किया।

वीर सावरकर की १९३७ में अंग्रेज़ी जेल से रिहाई की यादगारी में राशबिहारी ने जापानी पत्रिका दाई अजिया शूगी (बृहत् एशियवाद) में मार्च और अप्रैल १९३९ के अंक में वीर सावरकर की जीवनी से जुड़े लेख लिखे। लेख में यह सिद्ध करने के लिए कि सवारकर की रिहाई का सभी नेताओं ने स्वागत किया था, राशबिहारी ने राजगोपालचारि, सुभाष बोस, एम एन रॉय जैसे राष्ट्रीय नेताओं को उद्धृत किया। राशबिहारी ने संक्षेप में उनके उनके विचारों को कुछ इस प्रकार से प्रस्तुत किया: “अगर मैं सावरकर के प्रति कुछ महत्वपूर्ण लोगों के विचारों का सारांश प्रस्तुत करूँ तो सावरकर ‘शौर्य, पराक्रम, साहस, और देशभक्ति की पराकाष्ठा’ हैं। ‘उनकी प्रशंसा करना बलिदान की भावना की प्रशंसा करना है’। वो ऐसे लोगों में हैं ‘जिन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी की आग को जीवित रखा; वो एक ऐसे देशभक्त हैं जिन्होंने २०वीं सदी के शुरुआती दौर में हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई में जान तक की बाज़ी लगा दी। साथ–ही–साथ वे आधुनिक भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत के प्रणेता थे’”। बाद में राशबिहारी ने सावरकर का जीवन–चित्र लिखा जहाँ उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद एवं सेना की महत्ता के विषय पर सावरकर के विचारों का सारांश प्रस्तुत किया:१) सभी भारतियों को एक जैसे देखने का कोई तात्पर्य नहीं है। तुर्की में तुर्क देशवासी हैं। भारत में हिंदू देशवासी हैं बाक़ी अन्य मतावलंबि अल्पसंख्यक हैं।”

उन्होंने (सावरकर ने)हिंदू की परिभाषा सिंधु नदी के आस–पास के क्षेत्र के प्रति श्रद्धा रखनेवालों के रूप में की।” २) “मानें या न मानें, सेना ज़रूरी है। बंदूक़ के बल पर ही राष्ट्रों को आदर मिलता है। बिना बंदूक़ के शांति का अस्तित्व नहीं है। हमें जो अंतर्राष्ट्रिय सहयोग मिल रहे हैं उनका उपयोग करना चाहिए। स्वतंत्रता किसी भी विचारधारा से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र होने के लिए हमें पहले मज़बूत होना पड़ेगा। जापान का चीन पर क़ब्ज़ा करना सही है या ग़लत यह महत्वपूर्ण नहीं है। दुनियाँ अपने देशों की परवाह ख़ुद कर लेती है। हमें किसी अन्य देश से मदद की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।” उन्होंने अपने लेख की समाप्ति यह कहते हुए की “अगर आप सावरकर से सहमत हैं, तो आपके पास राजनैतिक शक्ति होगी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उनका दृष्टिकोण बहुत ही ज़ोरदार है” [११]। (मूल लेख जापानी भाषा में है और इसका संस्कृत अनुवाद हमें रणजीत सावरकर, अध्यक्ष स्वतंत्रयवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक से प्राप्त हुआ।)

सेक्शन B.: जापान में हिंदुस्तानी खानपान को प्रचलित करना

 सन १९२० के दशक में राशबिहारी अपने ससुरजी की नाकामूर्या बेकरी की कार्यकारिणी के सदस्य बन गए पृष्ठ ५९, [१०], [२]। वहाँ उन्होंने ‘इंडो कारी’ नाम की कढ़ी की शुरुआत की पृष्ठ ६, [२], और साथ ही साथ माल–सामग्री की आपूर्ति–शृंखला की नीव डाली [६]। जैसा कि रसल और कोन ने कहा है, “यह आम काढ़ियों से महँगा होने के बावजूद काफ़ी प्रचलित था और राशबिहारी नाकामूर्या के नाम से जाने जाने लगे। यह अभी भी टोक्यो का मशहूर कढ़ी रेस्तराँ है” पृष्ठ ६, [१२]। जापानी–निवासियों ने यहाँ तक कि सन २०११ तक शिनजकु नाकामूर्या के ‘इंडो कारी’ के विषय में ब्लॉग लिखे हैं। यह व्यंजन कम से कम उस समय तक तो ज़रूर पेश किया जाता रहा था [२]। नकमूराया की वेब साइट पर शायद राशबिहारी और तोशिको की बंगाली–शैली की साड़ी वाली तस्वीर भी थी [६]।

सेक्शन C: नकारात्मक प्रचार

 राशबिहारी ने एक लेख लिखा भारत: एक रक्त बैंक, जिसके माध्यम से उन्होंने भारत के आर्थिक उत्प्रीरण की क़लई खोली थी। “आजकल भारत में रक्त बैंकों का प्रचलन हैं, कम से कम अंग्रेज़ी अधिकारियों में ज़रूर। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अंग्रेज़ पूरे विश्व में रक्त बैंक खोलने में और दूसरे देशों का रक्त चूसकर अपने देशद्वीप के आर्थिक जीवन को सींचने में माहिर हैं।

हालाँकि भारत में अंग्रेज़ों ने हवाई हमलों और अन्य आपातकाल के शिकारी मरीज़ों के लिए रक्त बैंक अभी सिर्फ़ हाल–फ़िलहाल में ही खोले हैं। मगर पिछले दो सौ सालों से पूरा का पूरा भारतीय उपमहाद्वीप पाँच हज़ार मील दूर रह रहे चार करोड़ अंग्रेज़ों की हिमाक़त में लगा रहा है।

अंग्रेज़ों के आने से पहले भारत दुनियाँ के सबसे सम्पन्न देशों में था। आज हिंदुस्तान के चालीस करोड़ लोग ‘दयालू’ अंग्रेज़ी हुकूमत के तहत सूखे और ग़रीबी, महामारी और भुखमरी की वजह से सिर्फ़ अस्थि–पंजर बन कर रह गए हैं। अंग्रेज़ी पिशाचों ने हिंदुस्तानियों का रक्त चूस कर अपनी ज़िंदगी हरियाली कर ली है, और इन दो सौ सालों तक ख़ून चूसने के बाद भी वो भारत की गर्दन को अपने पंजे से जाने नहीं देना चाहते।

भारत में थोक के भाव में लूट–खसोट अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए एक आम बात थी। प्रत्यक्ष धन–सम्पदा की लूट और उद्योगों का, जो कि अंग्रेज़ी व्यापारों से मुक़ाबला करने की क्षमता रखते थे, योजनाबद्ध तरीक़े से विनाश करना अंग्रेज़ों की ख़ून–चूसने वाली नीति का एक आम हिस्सा था। अपने आप को दस्युराज के रूप में स्थापित कर लेने के पश्चात अंग्रेज़ों ने मान–सम्मान का मुखौटा ओढ़ लिया पर लूट–खसोट वैसे ही चलती रही। वे भारत का उत्प्रीरण पहले जैसे ही क्रूर पद्धति से करते रहे पर उनकी शैली थोड़ी सुधर गए थी। अंग्रेज़ों के द्वारा भारत के इस नए आर्थिक उत्प्रीड़ण के चरण ने व्यावसायिक विशेषाधिकार, पूँजी के एकाधिपत्य, भेद–भाव करने वाली चुंगी का रूप ले लिया।

भारतीय उद्योग और जहाज़रानी के तटीय यातायात गला–घोंटू हो गए। इन सब के अतिरिक्त अंग्रेज़ी ख़ज़ाने में रोज़ाना नौसेना रक्षा, अंग्रेज़ी सेना को भारत के अधिग्रहण, और अंग्रेज़ी नौकरशाही और सेना की सेवनिवृत्ति के ख़र्चे की अदायगी भी भारतीय लोगों के मत्थे मढ़ दी गए है। इतना ही नहीं, पौंड और रुपए के बीच विनिमय की दर भी मनमाने ढंग की है। इस दर के के चलते भारत को पूँजी और वेतन के हर एक रूपए में दो पेंस का घाटा होता है। इस तरह से अंग्रेज़ी पिशाच भारत का ख़ून चूसते जा रहे हैं, पर शायद वैसा खुले आम लूट–खसोट नहीं जैसा कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के मुलाजिम करते थे। पर हाँ, करते उतने ही निर्लज्ज तरीक़े से हैं।

अंग्रेज़ यह जानते हैं कि यह ख़ून चूसने वाला समय जल्दी ही समाप्त होने को है। इसी वजह से वे भारत के आर्थिक जीवन को विध्वंस करने वाले घृणित कामों में तेज़ी ला रहे हैं। इसी वजह से अंग्रेज़ों ने अभी हाल में ही १९ करोड़, नब्बे लाख पौंड का घोटाला किया। यह भारत का पैसा अंग्रेज़ी निधियों में जमा था। अंग्रेज़ों ने इस महीने के आख़िर तक भारत के और ६ करोड़ पौंड के निकासी की धमकी दी है। इतना ही नहीं, ये ख़ून चूसने वाले अंग्रेज़ी पिशाच तीन महीनों से सामूहिक जुर्माने के रूप में भूखे भारतीय किसानों को लूटते रहे हैं। हिंदुस्तानी क्रांति के पहले तीन महीनों में अंग्रेज़ों ने लगभग एक करोड़ पैंतालिस लाख रुपयों की लूट की है।

अंग्रेज़ों ने इस प्रकार बड़ी बेरहमी से हिंदुस्तान में अपने लिए दुनियाँ का सबसे बड़ा रक्त–बैंक स्थापित कर लिया है जहाँ ४० करोड़ लोगों का ख़ून ४ करोड़ अंग्रेज़ों की विलासिता और उनकी विश्व–प्रधानता बनाए रखने के लिए बहाया जाता है।

पर चालीस करोड़ भारतवासियों को अंग्रेज़ों की छोटी–मोटी सहनुभूतियों के लिए शुक्रगुज़ार होना चाहिए। अंग्रेज़ों ने बड़े धूम–धड़ाके से हिंदुस्तान के कुछ छोटे–मोटे कोनों में दो–चार रक्त–बैंक खोले हैं। इन रक्त–बैंकों के रक्त हट्टे–कट्ठे हिंदुस्तानियों के होंगे जिसका उपयोग हवाई हमलों और युद्ध के पीड़ितों अन्य अंग्रेज़ों के इलाज में होगा” पृष्ठ २१०–२१२, [१०]।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ही राशबिहारी ने अंग्रेज़ों के राजनैतिक पाखंड और भेदभाव की कलई खोलते हुए एक तीखा लेख ‘India rules herself’ लिखा: “अंग्रेज़ विश्वयुद्ध के बाद भारत को पूर्ण आज़ादी देंगे, ऐसा विश्वास दिलाने के लिए ढोंगी और साम्राज्यवादी अंग्रेज़ और उनके झाँसे में आए हिंदुस्तानी लोगों ने एड़ी–चोटी का पसीना एक कर दिया है। अंग्रेज़ तो यहाँ तक कि तत्काल अप्रत्यक्ष आज़ादी का वायदा भी करने लग गए हैं। वो अपने इन वायदों में इतने खरे और निष्कपट हैं कि जब भारत के नेता ऐसे प्रस्तावों का तिरस्कार करते हैं तो उन्हें बड़ा आश्चर्य होता है। अपनी नेकनियती के दिखावे के लिए अंग्रेज़ और उनके चमचे अक्सर यह साबित करने से बाज़ नहीं आते कि वो भारत के साथ एक आज़ाद देश के रूप में वर्ताव करते हैं। भारत के सेक्रेटेरी ओफ़ स्टेट से लेकर छोटे–मोटे राज्य का गवर्नर तक हर अंग्रेज़ी अधिकारी कम से कम हफ़्ते में एक बार यह याद दिलाने से बाज़ नहीं आता कि अंग्रेज़ी वायसराय के इग्ज़ेक्युटिव काउन्सिल में ११ हिंदुस्तानियों के मुक़ाबले सिर्फ़ तीन अंग्रेज़ हैं। इस प्रकार हिंदुस्तानियों को यह मानने को कहा जाता है कि उनका शासन हिंदुस्तानियों के हाथ में ही है।

सतही तौर पर यह तर्क ज़रूर ठोस प्रतीत होता है। पर जब थोड़ा अंदर जा कर देखें तो अंग्रेज़ों का दोमुँहा छल सामने आता है। यह बात सही है की ‘ग्यारह बनाम तीन’ हिंदुस्तानियों के लिए बहुत बड़ा बहुमत है और ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान की सरकार में हिंदुस्तानियों की ही चलती होगी। क्या यह अप्रत्यक्ष आज़ादी नहीं है? — इसका जवाब पाखण्डी अंग्रेजो से पूछना चाहिए।

लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ये बेचारे ग्यारह पथभ्रष्ट हिंदुस्तानी निरंकुश वायसराय और तीन अन्य सदस्य, जिनके इख़्तियार में देश की रक्षा, वित्त, और परिवहन के मामले हैं, के आगे कर भी क्या सकते हैं? वायसराय अभी भी काउन्सिल में सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर सभी ग्यारह भारतियों के अस्तित्व को सारेआम नज़र अन्दाज़ कर सकता है। युद्ध के समय ब्रिटेन का प्रधान सेनापति सेना से लेकर सागर के नमक, चीनी, किरासन तेल और यहाँ तक की छोटी से छोटी ज़रूरत की चीज़ों और ग़रीब से ग़रीब गाँववालों तक पर अपना नियंत्रण रखता है। और वह वायसराय को छोड़कर हर किसी पर अपना इख़्तियार रख सकता है।

युद्ध के समय की अर्थ्व्यवस्थ की आड़ में अंग्रेज़ी वित्त कमेटी के सदस्य रत्ती–रत्ती भर की आमदनी और ख़र्चे पर कड़ी नज़र रखते हैं। कमेटी के ग्यारह भारतीय सहयोगी, यहाँ तक कि भारत के रक्षा सदस्य सर फ़िरोज़ खान नून तक, को पैसे–पैसे के लिए दान का कटोरा ले कर अंग्रेज़ी सदस्यों के पास जाना पड़ता था। इन भारतीय रक्षा सदस्य के पास अपनी नौकरी और महीने की ६००० रूपए की पगार की रक्षा के अतिरिक्त कुछ और रक्षा करने को है ही नहीं। अपने ख़ाली समय में ये अपने अंग्रेज़ी हाकिमों, जिन्होंने ने उन्हें ६००० रुपयों की पगार दे रखी है, के निरंकुश हुकूमत की वकालत कर सकते हैं। जहाँ तक भारत की असली सुरक्षा का मुद्दा है, उसका पूरा अधिकार सेनाधिपती के पास ही है।

और पाखण्डी अंग्रेज़ कहते हैं कि भारत की हुकूमत अब हिंदुस्तानियों के हाथ में है।

आप यह सोंच भी कैसे सकते हैं कि अंग्रेज़ रत्ती–भर शासन भी हिंदुस्तानियों को सौंपेंगे? वे भारत में भारत के हाकिम और शोषक के तौर पर हैं और जब तक हिंदुस्तानी ख़ुद इन अंग्रेज़ों को हिंदुस्तान से खदेड़ न भगाएँगे ये यहीं भारत के हाकिम और शोषक के रूप में डटे रहेंगे।

ये अंग्रेज़ महत्वपूर्ण ओहदों पर हिंदुस्तानियों का विश्वास कभी नहीं कर पाएँगे क्योंकि उन्हें हिंदुस्तान के नियंत्रण को छोड़ने का डर हमेशा बना रहता है। पर वे भारत में स्व–शासन का ढोल पीट कर भारत और दुनियाँ भर के लोगों को मूर्ख ज़रूर बनाते रहेंगे।

क्या आपको अंग्रेज़ों के पाखंड के और सबूत चाहिए? ये रहा ताज़ा सबूत। अंग्रेज़ी वायसराय ने रक्षा सेवाओं में डाक–तार की व्यवस्थाओं की पड़ताल के लिए एक आयोग का गठन किया है। इस आयोग का अध्यक्ष कौन होगा? एक भारतीय? नहीं, भगवान के लिए ऐसा न बोलें, इसकी कोई सम्भावना बिलकुल नहीं है। जिन उदार अंग्रेज़ों ने भारतियों को परोक्ष आज़ादी पहले से ही दे रखी है उन दरियादिल अंग्रेज़ों से रक्षा सम्बंधी मामलों में एक हिंदुस्तानी पर भरोसा रखने की उम्मीद करते हैं? नहीं, नहीं, यह माँग पंखंडि अंग्रेज़ों के लिए बहुत बड़ी है। क्या अंग्रेज़ों ने सर फ़िरोज़ खान नून, जिनको सिर्फ़ बैरकों और सेना अस्पतालों के निरीक्षण की छूट है, को रक्षा सदस्य नहीं बनाया? यहाँ तक की डाक–तार सम्बंधी व्यवस्थाओं की देखभाल का काम भी भारतियों को नहीं दिया जा सकता। सिर्फ़ अंग्रेज़ ही यह काम कर सकते हैं। इसी वजह से यह काम एक अंग्रेज़ को दिया गया है, एक सेवा–निवृत अंग्रेज़ अधिकारी को। वन्दे मातरम्” पृष्ठ २१२–२१४ [१०]।

संदर्भ सूची

[1] Subhas Chandra Bose, Congress President, Speeches, Articles, and Letters January 1938-May 1939, Collected Works of Netaji, Vol. 9, edited by Sisir Kumar Bose and Sugato Bose

[2] http://justhungry.com/indo-karii-nakamuraya-shinjuku-tokyo-plus-three-degrees-curry-hotness

[3] Subhas Chandra Bose “Indian Struggle”

[4] Saswati Sarkar, Jeck Joy, Shanmukh, Dikgaj Rashbehari Bose’s second war from East Asia – battleground Japan and Singaporehttp://www.dailyo.in/politics/rashbehari-bose-sachindranath-sanyal-japan-revolutionary-china-indian-freedom-struggle-second-world-war/story/1/9745.html

[5] Rash Beharir Atma-katha O dushprapya Rachana, edited by Amal Kumar Mitra

[6] http://indianfoodreviews.blogspot.in/2013/11/curry-and-freedom-fighter-rash-behari.html?m=1

[7] Rashbehari Bose, “Anachronistic Admiration”, Standard Bearer, May 1927, Vol-1, No-1, Pages 55-57

[8] JG Ohsawa “The Two Great Indians in Japan”

[9] Sachindranath Sanyal “Bandi Jiban”

[10] Rashbehari Basu – His Struggle for India’s Independence, Editor in chief, Radhanath Rath, Editor Sabitri Prasanna Chatterjee, Biplabi Mahanayak Rash Behari Basu Smarak Samiti

[11] https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=6910465149498857638#editor/target=post;postID=1825410271313671015;onPublishedMenu=allposts;onClosedMenu=allposts;postNum=0;src=postname

[12] Jesse Russel, Ronald Cohn: Rashbehari Bose

[13] Jeck Joy, Saswati Sarkar, Shanmukh, Dikgaj “The legend of Rashbehari Bose and the forgotten Hindu-German conspiracy’’http://www.dailyo.in/politics/rashbehari-bose-hindu-muslim-riots-partition-1947-mahatma-gandhi-independence-hindu-german-conspiracy-ina/story/1/8230.html

[14] BC Dutt Mutiny of the Innocents, Sindhu Publications Pvt Ltd, Bombay-1, 1971

[15] Subhas Bose, The Alternate Leadership, Speeches, Articles, Statements and Letters, June 1939-1941, Collected Works of Netaji, Vol. 10

[16] Subhas Chandra Bose, The Anti-Imperialist Struggle and Samyavada, Presidential Address at the Third Indian Political Conference, London, 10 June, 1933, India’s Spokesman Abroad, Netaji Collected Works, Vol. 8, Letters, Articles, Speeches and Statements, 1933-1937, pp. 240-263